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Wednesday, December 31, 2008

जाने क्यूँ ऐसी सवालात ने दिल तोड़ दिया...??

कुछ सवाल यूँ ही ना जाने कहाँ से घुमक्कड़ की तरह मन में आकर बैचेन से कर जाते है....ना तो आप उन्हें निकाल पाते है और ना ही आप उन सवालों से सहज हो पाते हैं....कुछ यादें कभी भी किसी भी कोने से झाँक कर चली जाती है , और पीछे छोड़ जाती है , अनसुलझे सवाल .....

यादों के पुलिंदों में अक्सर मैं उलझ जाता हूँ और हमेशा की तरह किसी साख के दरख्त पर अपने आपको अकेला महसूस करता हूँ....और फिर कुछ पंक्तियों को सहेजकर उसे अपनी मनोव्यथा के अनुसार आकृति देने की कोशिश करने लगता हूँ...

कुछ तो दुनिया के इनायत ने दिल तोड़ दिया
दिल तो रोता रहे और आसू ना बहे,
इश्क की ऐसी रवायत ने दिल तोड़ दिया ,
वो मेरे हैं मुझे मिल जायेंगे , आ जायेंगे
ऐसे बेकार खयालात ने दिल तोड़ दिया ,
आपको प्यार था मुझसे , की नही था मुझसे ,
जाने क्यूँ ऐसी सवालात ने दिल तोड़ दिया...

Friday, December 26, 2008

फिर कुछ इस दिल को बेक़रारी है

फिर कुछ याद आने लगा है...पुरानी यादें यूँ ही ताज़ा हो गई...लगा जैसे कल की ही बात हो...सबकुछ कितना अच्छा था..कितने अच्छे थे वो दिन..काश वो दिन फिर से लौट कर आ जाते..काश मैं फिर से उनके हाथो में हाथ डालकर दूर तलक जाया करता.....कुछ भी तो नही पता था..हम बस अपनी ही दुनिया में मस्त रहते थे...दिल बैठा जा रहा है...और मेरा मन बार बार ये गाना गुनगुना रहा है.....

फिर कुछ इस दिल को बेक़रारी है,
सीना ज़ोया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है,

फिर जिगर खोदने लगा नाख़ून,
आमद-ए-फ़स्ल-ए-लालाकारी है,

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िंदगी हमारी है,

बेख़ुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’,
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है,

Lyrics: Mirza Ghalib
Singer: Jagjit Singh

चलिए आप लोग भी ये गाना सुनिए....और जरुर बताये की आपको कैसा लगा ये गाना....

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Monday, December 15, 2008

काश हम इश्क ही ना करते

ये कविता मैंने तब लिखी थी जब जीवन से काफ़ी उदास था..समझ में नही आ रहा था की अब मैं क्या करूँ ..खैर वक्त बहुत बड़ा मलहम होता है ..चलिए आपलोग कविता पढ़ें और हमें जरुर बताएं आपलोगों को कैसी लगी


काश हम इश्क ही ना करते
ना करते किसी से प्यार
ना होती आँखों से नींद गायब
ना होती जेहन में उनकी याद ..

वो तो चले गए दामन छुरा कर
सारी खुशियों को समेटकर
सारे सपनो को छोरकर
सारे रिश्ते को तोड़कर

आलम अब है ये अपने जीवन की
बंद गली में रास्ता ढूँढ रहा
न जाने किधर बढ़ा जा रहा
अब भी शायद किसी की बाठ जोह रहा

ये मन है की नही मानता
पर ये दिल है सब जानता
मन का क्या यूँ ही तड़पेंगे
आस लगा के यूँ ही रोयेंगे
ए मन एक बार दिल से तो पूछ ले
अकेला चला जा रहा एक बार पीछे तो देख ले
ना कर उनको याद , ना कर किसी से फरियाद ...
मान ले दिल की बात और हो जा दिल के साथ ...