Monday, December 15, 2008

काश हम इश्क ही ना करते

ये कविता मैंने तब लिखी थी जब जीवन से काफ़ी उदास था..समझ में नही आ रहा था की अब मैं क्या करूँ ..खैर वक्त बहुत बड़ा मलहम होता है ..चलिए आपलोग कविता पढ़ें और हमें जरुर बताएं आपलोगों को कैसी लगी


काश हम इश्क ही ना करते
ना करते किसी से प्यार
ना होती आँखों से नींद गायब
ना होती जेहन में उनकी याद ..

वो तो चले गए दामन छुरा कर
सारी खुशियों को समेटकर
सारे सपनो को छोरकर
सारे रिश्ते को तोड़कर

आलम अब है ये अपने जीवन की
बंद गली में रास्ता ढूँढ रहा
न जाने किधर बढ़ा जा रहा
अब भी शायद किसी की बाठ जोह रहा

ये मन है की नही मानता
पर ये दिल है सब जानता
मन का क्या यूँ ही तड़पेंगे
आस लगा के यूँ ही रोयेंगे
ए मन एक बार दिल से तो पूछ ले
अकेला चला जा रहा एक बार पीछे तो देख ले
ना कर उनको याद , ना कर किसी से फरियाद ...
मान ले दिल की बात और हो जा दिल के साथ ...

Saturday, December 13, 2008

पाण्डेय जी vs पान्डी जी

"सर तो वो उपर नीचे ऐसे  कर रहा था जैसे कोइ कसाइ बकरा  हलाल करने  का इन्त्ज़ार कर रहा हो"...और  मन ही मन सोच रहा हो आ जा बेटा..बहुत दिनो से तेरा इन्तेज़ार था.....

ये उन दिनो की बात है जब मैने पहली बार नौकरी join की थी..शुरुवात मे २ महीने का training था..उसके बाद company मे joining थी...और ये उपरोक्त बाते मेरे दिमाग मे तब आयी थी जब मैने अपने PM को पहली बार 
देखा था.....वो २ महीने मैने कितनी मस्ती की मत पूछिये...वो फिर कभी विस्तार मे लिखुगा....२ महीने के बाद company मे आया था...

पहला दिन induction program था...उसि दिन कुछ higher official से भी मिला...मेरा PM उस दिन छुट्टी पर 
था..इसलिय उस दिन सिर्फ़ उस्सेय फोन पर हमारी बात करयी गयी ....मेरे PM के अन्दर कुल ५ लोग थे...उसी दिन हमे पता चला की मेरे PM का नाम आनन्द कुमार पान्डे है....

मस्त न...मस्त क्यो? अच्छा अच्छा एक बात मै आपलोगो को बताना भूल गया मैने चेन्नै की एक company join की थी ....और chennai की company मे जहां उतर भारत के लोग मुश्किल से पाये जाते है वहां आपका PM कोइ पान्डे होगा तो खुशी तो होगी ही न...

क्युं था ना मस्त? मै खुश था चलो कोइ उतर भारतीये अपना PM है...कभी कभी तो हिन्दी मै बात होगी ही....पहला दिन  तो कुछ नही हुआ ...६ कब बज गया पता ही नहिं चला...वो प्रथम और आखिरी दिन था जब मै ६ बजे company से निकल गया था.....

दूसरा दिन मै ९ बजे office पहुच गया था..अरे भाइ अपनी छवि बनानी थी ना...इसलिय बिल्कुल समय पर पहुच गया था...काम PM के आने के बाद ही पता चलता की क्या करना है..?इसलिय PM का इन्तज़ार करने लगा....इसी बीच lunch का समय  भी हो चला था...हां तो lunch भी हो गया ..लेकिन PM साहेब का कोइ अता-पता नही था..खैर ३ बजे बुलावा आया.....मतलब PM साहेब आ गये थे...उनसे मिलने जाना था....

"सर तो वो उपर नीचे ऐसे  कर रहा था जैसे कोइ कसाइ बकरा  हलाल करने  का इन्त्ज़ार कर रहा हो"...और  मन ही मन सोच रहा हो आ जा बेटा..बहुत दिनो से तेरा इन्तेज़ार था.....

खैर हाइ  हेल्लो हुइ...उसकी अग्रेंज़ी सुनकर कुछ धक्का सा लगा...उतर भारतीये  की अग्रेंज़ी ऐसी तो नहि होती है...फिर सोचा की हो सकता है यहां रह्ते रह्ते ऐसा हो गया हो..फिर उसे तमिल बोलते भी सुना....लेकिन यार ये तो पान्डेय है...पान्डेय तो पक्का  उतर भारतीये होते है....चलो तमिल भी सीख गया होगा..

office क दूसरा दिन और मैन ८ बजे निकल office से....PM से project के बारे मै विचार-विमर्श हुआ....क्या 
करना है क्या नहि .....लकिन मेरी उत्सुकता अभी तक बरकरार थी..जानने को बेत्ताब था मै आखिर ये चक्कर क्या है बास ..ये पान्डेय साहब कब से तमिल जैसे हो गये? आखिर ये है कहां के?माज़रा क्या है?बस फिर क्या थ मैने पूछ ही लिया अपने बगल मए बैठे collegue से....और जो सच सामने आया ..

वो ये कि भाइ साहब पक्के तमिल थे...उनका उतर भारत  से दूर दूर तक कोइ रिश्ता नही था....फिर ये नाम क्यु ऐसा है...अब क्या कहुं वो गलती मेरी ही थी..उनका नाम पान्डेय न होकर पान्डी था....इसलिय वो पक्के तमिल थे..और अभि भी  है .कहां जायेगें बेचारे...आज भी मेरा PM वही है..आज भी जब वो बात सोचता हु तो काफ़ी हंसी आती है...

Saturday, December 6, 2008

कुछ खट्टी कुछ मीठी

मैं काफ़ी दिनो के बाद फिर से ब्लॉग लिख रहा हुन्.ये ब्लॉग मैने तब शुरु किया था जब मै कालैज मे  था.
उस समय मैने मुश्किल से 2 या 3 पोस्ट किये होगे॑ ... कॉलेज जीवन काफ़ी  व्यस्त थी ... 
या यू कहे तो मै काफ़ी वयस्त था.  परीक्षा, गर्लफ्रेंड, दोस्त.... मतलब ब्लॉग शुरु तो कर लिया था लेकिन कभी इसे  जारी   नही रख पाया ...पिछले एक या दो महीने से मेरा काफ़ी  मन कर  रहा था की मै फिर से लिख्नना शुरु करु ... फिर से अपने   ख्यालो की दुनिया सजाउ .... समय अभी भी नही मिल पाता है लकिन् अब ऐसा करने के लिए मैं समय  के भरोसे नही रह् सक्ता. .. बस अब मै  लिख्नना चाह्ता हुउ..... 

फर्क बस इत्ना है की पहेले मै कॉलेज  मै  था और अब मै नौकरी कर रहा हू ..  फुर्सत्  तब भी नही थी .. और अब भी  नही है .... लकिन अंतर ये है की अब मै लिखुन्गा और  अपने लिये लिखुन्गा .... 

बस आज के लिये इत्ना ही.. हान् लेकिन अब मै नियमित पोस्ट कऱ्ता ऱ्हुन्गा ...बहुत सारी यादें जुडी हुइ हैं मेरे साथ .. कुछ खट्टी कुछ मीठी ..... और मै ये  सब आप  सबके साथ बाट्ना चाह्ता हुन् जो की कहीं दिल के किसी कोने मै छुपा हुआ है...