Wednesday, January 14, 2009

पहेली का जवाब ..

सबसे पहले आप सबको मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं
वाह ! वाह ! भाई वाह ! मैंने तो अपने तरफ़ से थोड़ा कठिन सवाल पूछा था , पर लगभग सभी लोगो ने सही जवाब दिया | जी हाँ ये कोल्हापुर का न्यू पैलेस ही है | उत्तर देने वालो में सबसे पहले PN Subramanian जी ने सही जवाब दिया | उनको ढेर सारी बधाईयाँ ..... उसके बाद अल्पना जी एवं समीर जी ने ना केवल सही जवाब दिया बल्कि इसके बारे में हमें जानकारी भी दी |

इसके बाद सीमा जी (आप यहाँ पुरा details पढ़ सकते हैं ) ने तो पुरा इतिहास ही हमें बता दिया | सीमा जी का बहुत बहुत आभार | सीमा जी के लिखने के बाद , कुछ और जानकारी नही बचता है देने के लिए | इसके अलावा सुशीलजी , ताऊ , संगीता जी , मोहन जी , प्रभात जी एवं और भी लोग , सभी ने सही जवाब दिए |
कुछ और ख़ास बातें इस महल के बारे में ...
इस महल को मेजर मंत ने डिजाईन किया था | इस महल पर जैन तथा हिंदू दोनों धर्मो की मिली जुली संस्कृति का प्रभाव देखने को मिलता है | गुजरात , राजस्थान तथा लोकल राजवाडा का प्रभाव भी देखने को मिलता है | प्रथम तल्ला पर जो म्यूज़ियम है वो सही में देखने लायक है | महाराजा साहो जी छत्रपति नाम से मशहूर ये म्यूज़ियम बहुत से अनमोल धरोहर को संभाल के रखा हुआ है | अभी भी इसके दुसरे तल्ले पर महाराजा के वंशज रहते हैं | जब भी मौका मिले यहाँ जरुर जाएँ |

एक नज़र आज के मेरिट होल्डर्स पर
१) सुब्रमनियम जी
२) अल्पना जी
३) समीर जी
४) प्रभात जी
५) संगीता जी
६) सीमा जी
स्पेशल मेरिट होल्डर : सीमा जी

Tuesday, January 13, 2009

एक और पहेली ! बूझो तो जाने ?

आज सुबह सुबह मुझे कुछ नही सूझा तो सोचा मैं भी क्यूँ नही कुछ पहेली बुझाऊं ? और फिर बस क्या था , आव देखा न ताव बस चिपका दिया ये फोटो | आप लोग बूझें की ये चित्र किस चीज़ का है , कहाँ हैं ? जितना जयादा विस्तार में बताएँगे उतना और लोगो को भी फायदा होगा | और हाँ मैं बस इतना कह सकता हूँ की ये भारत में ही है | चलिए अपने अपने दिमाग पर जोर डालिए और इस आसान सी पहेली का जवाब दीजिये |

और हाँ ताऊ को धन्यवाद | मुझे ये पहेली की प्रेरणा उन्ही सी मिली |


Monday, January 12, 2009

साप्ताहांत बंगलोर में - एक मैक्रो पोस्ट

काश ये समय यहीं रुक जाता , काश मैं कुछ लम्हे और यहाँ बिता सकता | इसबार भी मैं साप्ताहांत मनाने बंगलोर गया हुआ था | वो शीतल हवाएं , गुनगुने धुप मुझे अपने शहर की याद दिला देते हैं | अन्तर सिर्फ़ इतना है की बंगलोर में नॉर्थ इंडिया जैसा कडाके की ठण्ड नही पड़ती है | यहाँ की शीतल हवा में अजीब सी ताजगी रहती है , आपका रोम रोम प्रफुल्लित महसूस करता है | यहाँ आने पर मुझे लगता है की मैं प्रकृति के करीब आ गया हूँ | सारी थकान ख़ुद - ब - ख़ुद गायब हो जाती है |

कहते भी हैं की अगर अपने आप में नई ताजगी , नई स्फूर्ति पैदा करना चाहते हैं तो प्रकृति के करीब जाइए | बंगलोर तो ऐसा शहर है जो प्रकृति की गोद में बसा हुआ है | अब तो काफ़ी कुछ बदल गया है , लेकिन अब से कुछ साल पहले करीब १९९७ में मैं पहली बार बंगलोर गया था | उस वक्त आपकी नज़र जिधर जाती उधर आपको हरयाली ही हरयाली दिखती | अब तो केवल कंक्रीट के जंगल जयादा दीखते हैं | जिस निर्बाध तरीके से पेड़ों की कटाई चल रही है वो दिन दूर नही जब चारो तरफ़ सिर्फ़ कंक्रीट के जंगल ही दिखेंगे |

लेकिन अभी भी ये शहर अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात है | इस शहर के बारे में कभी आराम से कुछ चित्रों के साथ लिखूंगा | बस अभी जल्दी जल्दी ऑफिस के काम निपटा लूँ |